हल्का ऐलनाबाद के चुनावों का सार

ऐलनाबाद की सीट 2008 के परिसमन के बाद अस्तित्व में आई थी। परिसमन के बाद, पहला आम चुनाव 2009 में हुआ था|  यहां, इनैलो से ओम प्रकाश चौटाला ने चुनाव लड़ा और कांग्रेस से भरत सिंह बैनीवाल उम्मीदवार थे|  ओम प्रकाश चौटाला ने 64567  वोट प्राप्त किए व  कांग्रेस के उम्मीदवार भरत सिंह बैनीवाल ने 48144 वोट प्राप्त किए। ओम प्रकाश चौटाला ने भरत सिंह बैनीवाल को 16423 वोटों के अंतर से हराकर जीत का परचम लहराया। परन्तु  ओम प्रकाश चौटाला ने उचाना और ऐलनाबाद दोनों सीटों से चुनाव लड़ा था व दोनों में ही जीत हांसिल की|  इसलिए उन्होंने  ऐलनाबाद से अपना  इस्तीफा दे दिया। ओम प्रकाश चौटाला के इस्तीफे के बाद हुए  उपचुनाव में ओम प्रकाश चौटाला के छोटे बेटे अभय सिंह चौटाला ने चुनाव लड़ा व  लगभग 6000 वोटों से जीत प्राप्त की थी।

 2014 में, इनैलो की आसान जीत मानने वाली ऐलनाबाद सीट से भाजपा ने पवन बैनीवाल को टिकट देकर अभय सिंह चौटाला के लिए यह मुकाबला बड़ा रोचक बना दिया। कभी करीबी और सहयोगी रहे, पवन बैनीवाल ने उनके खिलाफ पूरी ताकत से चुनाव लड़ा, मोदी लहर के चलते पवन बैनीवाल को 57623 वोट मिले। कांग्रेस से पहली बार चुनाव लड़ रहे रमेश भादू को मात्र 11491 वोट मिले। इस चुनाव में अभय सिंह चौटाला ने 11539 वोटों से जीत प्राप्त की।

 

2019 के चुनाव से पहले जजपा के  इनैलो से अलग होने के कारण अभय सिंह को भरी नुक्सान की आशंका लगाई जा रही थी और इस बार कांग्रेस ने भी भारत सिंह को अपना टिकट सौंप दिया व भाजपा ने पवन बेनीवाल पर फिर से भरोसा जताया|   ऐलनाबाद के तीनों राजनीति के खिलाड़ी अपनी-अपनी पार्टियों से मैदान में आ गए|   भरत सिंह बेनीवाल के मैदान में आने से मुकाबला त्रिकोणीय होने के आसार बनने लगे थे  परंतु भरत सिंह बैनीवाल अपने आपको चुनाव में लम्बे समय तक नहीं रख पाए। हरियाणा में  दोबारा भाजपा की सरकार आने की उम्मीद के कारण लोगों का झुकाव  पवन बेनीवाल की ओर होने लगा था, परंतु अभय सिंह चौटाला ने धीरे-धीरे राजनीतिक शतरंज के घोड़े खोलने शुरू कर दिया। इसी कड़ी में अन्य लोगों के साथ - साथ पुराना दड़बा हल्का जिसने हमेशा चौटाला परिवार का सहयोग किया,  इस बार भी अभय सिंह का  भरपूर साथ दिया। पवन बैनीवाल और भरत सिंह बैनीवाल दोनों के  इसी पुराने दड़बा हल्का से आने के कारण यहां वोटों का विभाजन हुआ जिसका लाभ अभय सिंह को मिला जिस से उन्होंने एक बार फिर ऐलनाबाद से 11922 वोटों से जीत प्राप्त की।

 

2014 में कांग्रेस पार्टी को भरत सिंह बैनीवाल की टिकट काटने का खामियाजा भुगतना पड़ा 2009 में 48000 से ज्यादा वोट प्राप्त करने वाली पार्टी 11000 वोट पर सिमिट कर रह गई जिसका नुक्सान भरत सिंह बैनीवाल को व्यक्तिगत रूप में भी हुआ उनका अपना व्यक्तिगत वोट भी इधर - उधर बिखर गया। 

2009 के चुनाव में भाजपा को मात्र 3618 वोट प्राप्त करने वाली पार्टी 2014 के चुनाव में 57000 से ज्यादा वोट प्राप्त कर लेती है  इसे मोदी लहर, पवन बैनीवाल का करिश्मा कहेंगे या इनैलो का विरोध। 

2019 चुनाव के मुख्य तथ्य :

भरत सिंह बैनीवाल शुरू से ही कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़े रहे है  व इसका व्यक्तिगत वोट भी काफी अच्छा था परन्तु  2014 में टिकट कटने  की कारण इनका व्यक्तिगत वोट इनैलो की तरफ ज्यादा गया था| 2019 में वापसी करने पर भी पार्टी की कमजोर स्थिति के कारण वे अपनी जीत का भरोसा मतदाता को नहीं दिला पाए जिस से अपने दूर हुए  व्यक्तिगत  मतदाता  को  वापिस लाने में सफल नहीं हो पाए। उन्हें  एक सम्मान जनक वोट से ही संतोष करना पड़ा और गांव मलैका में नरेंद्र मोदी की  रैली के दिन पवन बैनीवाल का रैली में व्यस्त होने के कारण अभय सिंह चौटाला हल्के में अपना खेल, खेल गया इसका फायदा भी इनैलो को  मिला|  इसके साथ - साथ  रणजीत सिंह चौटाला, गोकुल सेतिया और अन्य नेताओं का  व्यक्तिगत वोट इनेलो की तरफ चला गया।  इस चुनाव में अभय सिंह चौटाला ने अपने सारे राजनैतिक दावपेच अपनाये और जीत में बदलने में कामयाब हुए |

 

2020 के कृषि नियमों को लेकर किसानों ने समर्थन में अभय सिंह चौटाला के अपने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया | इस सीट पर जुलाई में उपचुनाव होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है

पश्चिम बंगाल चुनाव का विश्लेषण

2 मई का दिन किसी के लिए खुशी तो किसी के लिए मायूशी वाला रहा। क्योंकि इस दिन पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के अप्रत्याशित नतीजे आए थे। ममता बनर्जी को तीसरी बार सरकार बनाने के लिए लोगों ने अपना पूरा समर्थन देकर एक इतिहास रच दिया था, चुनाव में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने जरूरत से ज्यादा इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर माहौल को अपने ही खिलाफ कर लिया। भाजपा ने अपना ज्यादा ध्यान और समय ममता बनर्जी के खिलाफ बोलने और उनकी कमियों को प्रचारित करने में निकल दिया। हालाँकि यह भाजपा की चुनावी रणनीति का हिसा था

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के साथ-साथ सभी स्थानियों नेताओं ने अपने भाषणों में दीदी को कोसने के अलावा किसी दूसरे मुद्दे पर ध्यान ही नहीं दिया। टीएमसी सरकार के कई वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों, जिनमें 24 विधायक, एक सांसद, राजनीतिक हैवीवेट सुवेन्दु आदिकारी और राजीब बनर्जी शामिल हैं, भाजपा ने उन नेताओं को शामिल किया है जिन पर पहले आरोप लगाए गए थे।

दूसरी तरफ करो या मरो के अवस्था में ममता बनर्जी ने इस चुनाव में सकारात्मक व्यवहार से काम लिया। सुवेन्दु आदिकारी द्वारा नंदीग्राम से चुनाव लड़ने की चुनौती को स्वीकार करके अपने कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया व किसी और दूसरे हल्के से चुनाव न लड़ने के फैंसले ने उनके प्रति एक मज़बूत, सकारात्मक व निर्भय व्यक्तित्व को उभार दिया जिसने मतदाताओं को बहुत आकर्षित किया।

टीएमसी नेतृत्व ने 'बंगाली गौरव' को अपनाया और भाजपा की पहचान की राजनीति का मुकाबला करने के लिए महिला शक्ति के चारों ओर एक चुनावी कहानी बनाई।

भाजपा को पूर्ण विश्वास था कि टीएमसी की सरकार होने के कारण सरकार विरोधी लहर का वोट हमारी पार्टी की और आएगा । उधर सीपीआई (एम) कांग्रेस आदि पार्टियां अपने वोट को होल्ड कर जाएगी और हम पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बना लेंगे। परंतु भाजपा अपने वोट को साथ जोड़े रखने और सरकार विरोधी वोट को अपने साथ लाने में भी कामयाब हुई। परन्तु तीनों कृषि कानूनों को लेकर, किसान व मजदूरों का जो आंदोलन चल रहा है उस पर कोई सकारात्मक बात ना करने के कारण भाजपा के साथ-साथ मोदी की छवि पर बुरा प्रभाव पड़ा।

हालांकि टीएमसी के खिलाफ अल्पसंख्यक तुष्टिकरण , जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार, विशेष रूप से चक्रवात अम्फान के दौरान, बेरोजगारी के संकट, पार्टी से बड़े पैमाने पर पलायन जैसे गंभीर मुद्दे थे व पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के भारतीय धर्मनिरपेक्ष मोर्चे (ISF) में प्रवेश, ये सब पार्टी के खिलाफ जा सकते थे।

कांग्रेस-आईएसएफ गठबंधन का एक अच्छा प्रदर्शन व सत्ताधारी पार्टी के मुस्लिम वोट का बंटवारा भाजपा के लिए मददगार साबित हो सकता था परन्तु कांग्रेस व सीपीआई (एम ) दोनों ही पार्टी हमेशा किसानों के मुद्दे उठाती है,, तथा इस बार कृषि कानूनों लेकर उनमे काफी आक्रोष था। एंटी-इनकंबेंसी के चलते भाजपा ने जो टीएमसी के वोटों को अपनी तरफ किया , कांग्रेस व सीपीआई (एम ) के वोटर ने टीएमसी के पक्ष में बम्पर वोटिंग करके भाजपा के खिलाफ अपना रोष प्रकट कर दिया।

भाजपा की डाटा विश्लेषण व रिसर्च टीम से टीएमसी की तरफ से भाजपा म आने वाले मतदाताओं के आंकलन में भारी चूक हुई। भाजपा ने टीएमसी के नेताओं को अपनी पार्टी में ज्वाइन करवाया, उनमें ज्यादातर लोगों के खिलाफ मतदाताओं की तरफ से पहले से ही विरोधी की लहर चल रही थी व भाजपा ने टीएमसी से आये बागी नेताओं पर ज्यादा विश्वास करने के कारण अपने कैडर का विश्वास खो दिया, जिससे ग्राउंड जीरो से सही फीडबैक नहीं आया और चुनावी नतीजे उलट हो गए। भाजपा बंगाल के मतदाताओं को अपनी सरकार आने के बाद किये गए वादों को पूरा करने का विश्वाश नहीं दिला पाई , जो की भाजपा का इस चुनाव में सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुआ।

आज के दौर में अकेले प्रचार- प्रसार से ही चुनाव नहीं जीत सकते। अकेला धुंआ - धार प्रचार करते है तो कई बार अकेला धुंआ ही रह जाता है धार किसी दूसरी पार्टी की तरफ चली इसलिए प्रचार- प्रसार के साथ-साथ आपको ग्राउंड जीरो से समय-समय पर फीडबैक, रणनीति और प्रबंधन पर भी ध्यान देना होगा।

"फीडबैक, रणनीति और प्रबंधन " पर अगले ब्लॉग में बात करेंगे।